मैं शायर तो नहीं – सीज़न २
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2hr 34m
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Urdu
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1 - कैफ़ी आज़मी - भाग १
04 min 45 sec
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2 - कैफ़ी आज़मी - भाग २
04 min 07 sec
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3 - कैफ़ी आज़मी - भाग ३
03 min 50 sec
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4 - कैफ़ी आज़मी - भाग ४
05 min 39 sec
1
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5 - कैफ़ी आज़मी - भाग ५
04 min 01 sec
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6 - मजरूह सुल्तानपुरी - भाग १
07 min 58 sec
3
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7 - मजरूह सुल्तानपुरी - भाग २
08 min 33 sec
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8 - मजरूह सुल्तानपुरी - भाग ३
08 min 33 sec
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9 - मजरूह सुल्तानपुरी - भाग ४
08 min 06 sec
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10 - मजरूह सुल्तानपुरी - भाग ५
06 min 55 sec
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मैं शायर तो नहीं – सीज़न २
About Show
| Episodes | Duration | |||
1 . कैफ़ी आज़मी - भाग १कैफी आज़मी का असली नाम अख्तर हुसैन रिजवी था। उत्तरप्रदेश के आजमगढ़ जिले के छोटे से गांव मिजवां में 14 जनवरी 1919 में जन्मे। गांव के भोलेभाले माहौल में कविताएं पढ़ने का शौक लगा। भाइयों ने प्रोत्साहित किया तो खुद भी लिखने लगे। 11 साल की उम्र में उन्होंने अपनी पहली गज़ल लिखी। ‘कैफ़ी आज़मी’ एक ऐसा नाम जिसे आप उसकी नज़्मों से, उसकी शायरी से जानते हैं। जो सिर्फ अपनी नज़्मों तक ही प्रगतिशील नहीं बल्कि अपनी ज़िंदगी में भी उतना ही प्रोग्रेसिव रहा। उन्होंने गरीब-अमीर के बराबरी की बात की, उन्होंने औरत-मर्द के बराबरी की बात की। इस बराबरी को लगातार अपनी नज़्मों के जरिए लोगों तक पहुंचाते रहे। ज़मींदार घराने से सम्बन्ध रखने के बावज़ूद कैफ़ी ने अपनी ज़िन्दगी में दोनों रंग देखे। आज हम आपके लिए उनके जीवन के इन्ही रंगों को बिखेरने वाले हैं। More | 04 min 45 sec | |||
2 . कैफ़ी आज़मी - भाग २कैफ़ी आज़मी हिंदी-उर्दू साहित्य के एक प्रमुख शायर थे। कैफ़ी जी अपने शेर और नाटक, दोनों के लिए ही बहुत लोकप्रिय थे। इस कार्यक्रम में उनकी ज़िन्दगी से जुड़े किस्सो पर चर्चा की गयी है। More | 04 min 07 sec | |||
3 . कैफ़ी आज़मी - भाग ३कैफ़ी आज़मी ने फिल्मों के गाने भी लिखे.। 'गर्म हवा’ जैसी फिल्मों को भला कौन भूल सकता है? हीर-रांझा’ के संवाद के लिए उनको फिल्म फेयर अवार्ड से नवाजा गया। उन्होंने फ़िल्मी दुनिया में अपनी खास जगह बनाई और अमर नग्में लिखे। More | 03 min 50 sec | |||
4 . कैफ़ी आज़मी - भाग ४कैफ़ी आज़मी साहब के लिखीं कागज के फूल, शमा, शोला और शबनम , हीर-रांझा, अनुपमा, इत्यादि फिल्मों के गाने बहुत मशहूर हुए। लेकिन फिल्म चल नहीं पा रहीं थीं फिल्म इंडस्ट्री ने उनसे परहेज़ करना शुरू कर दिया था। More | 05 min 39 sec | |||
5 . कैफ़ी आज़मी - भाग ५क़ैफ़ी आज़मी को राष्ट्रीय पुरस्कार के अलावा कई बार फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला। १९७४ में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। कैफ़ी साहब की याद भुलाए नहीं भूलती उनसा कोई दूसरा कैफ़ी पैदा नहीं होगा। More | 04 min 01 sec | |||
6 . मजरूह सुल्तानपुरी - भाग १मजरुह सुल्तानपुरी हिन्दी फिल्मों के एक प्रसिद्ध गीतकार और प्रगतिशील आंदोलन के उर्दू के सबसे बड़े शायरों में से एक थे। उन्होंने अपनी रचनाओं के जरिए देश, समाज और साहित्य को नई दिशा देने का काम किया। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा सुल्तानपुर जिले के गनपत सहाय कालेज में मजरुह सुल्तानपुरी ग़ज़ल के आइने में शीर्षक से मजरूह सुल्तानपुरी पर राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया। देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों के शिक्षाविदों ने इस सेमिनार में हिस्सा लिया और कहा कि वे ऐसी शख्सियत थे जिन्होंने उर्दू को एक नयी ऊंचाई दी है। लखनऊ विश्वविद्यालय की उर्दू विभागाध्यक्ष डॉ॰सीमा रिज़वी की अध्यक्षता व गनपत सहाय कालेज की उर्दू विभागाध्यक्ष डॉ॰जेबा महमूद के संयोजन में राष्ट्रीय सेमिनार को सम्बोधित करते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय के उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो॰अली अहमद फातिमी ने कहा मजरूह, सुल्तानपुर में पैदा हुए और उनके शायरी में यहां की झलक साफ मिलती है। वे इस देश के ऐसे तरक्की पसंद शायर थे जिनकी वजह से उर्दू को नया मुकाम हासिल हुआ। उनकी मशहूर पंक्तियों में 'मै अकेला ही चला था, जानिबे मंजिल मगर लोग पास आते गये और कारवां बनता गया' का जिक्र भी वक्ताओं ने किया। लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो॰मलिक जादा मंजूर अहमद ने कहा कि यूजीसी ने मजरूह पर राष्ट्रीय सेमिनार उनकी जन्मस्थली सुल्तानपुर में आयोजित करके एक नयी दिशा दी है। More | 07 min 58 sec | |||
7 . मजरूह सुल्तानपुरी - भाग २मजरूह सुलतानपुरी ने ग़ज़ल की क्लासिकी परंपरा में राजनीतिक प्रतीक बना कर साबित किया कि ग़ज़ल की विधा अपने तग़ज़्ज़ुल को त्याग किए बिना भी हर तरह के भावनाओं, संवेदनाओं और विचारों को प्रभावी और रोचक ढंग से व्यक्त करने की क्षमता रखती है। More | 08 min 33 sec | |||
8 . मजरूह सुल्तानपुरी - भाग ३मजरूह सुल्तानपुरी फ़िल्म में गीत लिखने के लिए राजी हो गए। संगीतकार नौशाद ने मजरूह सुल्तानपुरी को एक धुन सुनाई और उनसे उस धुन पर एक गीत लिखने को कहा। मजरूह ने उस धुन पर 'गेसू बिखराए, बादल आए झूम के' गीत की रचना की। शाहजहाँ फिल्म के लिखीं गई गीत 'जब दिल ही टूट गया' बेहद लोकप्रिय हुआ। More | 08 min 33 sec | |||
9 . मजरूह सुल्तानपुरी - भाग ४मजरूह सुल्तानपुरी की शायरी और फिल्मी नग्मों में जमीन से गहराई तक जुड़े उनके सरोकारों की छाप मिलती है। इसके अलावा, उन्होंने इश्क के तरानों को भी अपनी लेखनी से नए आयाम दिए हैं। More | 08 min 06 sec | |||
10 . मजरूह सुल्तानपुरी - भाग ५बुढ़ापे में वो फेफड़े की बीमारी से ग्रस्त हो गए थे। २४ मई २००० को बंबई के लीलावती अस्पताल में उनका देहांत हो गया। उनका ८० साल के जीवन काल में, उनका कभी ना भूला जाने वाला योगदान को न तो हम और न ही फिल्म जगत भूल सकता है। More | 06 min 55 sec |
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