इस्कॉन वृंदावन श्रीमद् भगवतम
Duration
62hr 51m
Language
Hindi
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Category
Devotional
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1 - श्लोक १६ स्कन्ध ५ अद्याय २४ - महा भागवत प्रभुजी
34 min 15 sec
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2 - श्लोक १७ और श्लोक १८ स्कन्ध ५ अद्याय २४ - कृष्ण दर्शन प्रभुजी
53 min 34 sec
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3 - श्लोक १९ और श्लोक २० स्कन्ध ५ अद्याय २४ - गुडकेश प्रभुजी
58 min 23 sec
1
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4 - श्लोक २१ स्कन्ध ५ अद्याय २४ - जितमित्र प्रभुजी
50 min 04 sec
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5 - श्लोक २२ स्कन्ध ५ अद्याय २४ - राधा श्यामसुंदर प्रभुजी
55 min 00 sec
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6 - श्लोक २३ और श्लोक २४ स्कन्ध ५ अद्याय २४ - नवद्वीप प्रभुजी
47 min 23 sec
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7 - श्लोक २५ स्कन्ध ५ अद्याय २४ - नवद्वीप प्रभुजी
53 min 49 sec
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8 - श्लोक २६ स्कन्ध ५ अद्याय २४ - नवद्वीप प्रभुजी
47 min 07 sec
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9 - श्लोक २७ स्कन्ध ५ अद्याय २४ - पुरुषोत्तम प्रभुजी
55 min 57 sec
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10 - श्लोक १ स्कन्ध ५ अद्याय २५ - मधुह प्रभुजी
46 min 03 sec
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इस्कॉन वृंदावन श्रीमद् भगवतम
About Show
| Episodes | Duration | |||
1 . श्लोक १६ स्कन्ध ५ अद्याय २४ - महा भागवत प्रभुजीश्लोक १6 - हे राजन्, अब मैं तुमसे अतललोक से प्रारम्भ करके एक एक करके समस्त अधोलोकों का वर्णन करूंगा। अतललोक में मय-दानव का पुत्र बल नामक असुर है, जिसने छियानबे प्रकार की माया रच रखी है। कुछ तथाकथित योगी तथा स्वामी आज भी लोगों को ठगने के लिए इस माया का प्रयोग करते हैं। More | 34 min 15 sec | |||
2 . श्लोक १७ और श्लोक १८ स्कन्ध ५ अद्याय २४ - कृष्ण दर्शन प्रभुजीश्लोक १७ - ऐसा प्रतीत होता है कि भव तथा भवानी अर्थात् शिवजी तथा उनकी पत्नी के सम्भोग करने पर जो वीर्य निकलता है, उसमें जो रसायन होता है उसे अग्नि में तपाने पर सोना उत्पन्न किया जा सकता है। कहा जाता है कि मध्य युग के कीमयागर निम्न धातु से सोना बनाना जानते थे और श्रील सनातन गोस्वामी का भी कथन है काँसे को पारे से अभिकृत करने पर सोना बन सकता है। श्रील सनातन गोस्वामी का यह उल्लेख निम्न वर्ग के पुरुषों को ब्राह्मण बनाने के प्रसंग में हुआ है श्लोक १८ - पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को उत्तमश्लोक कहा गया है, जिसका अर्थ है, जिसकी आराधना श्रेष्ठतम चुने हुए संस्कृत श्लोकों से की जाती है तथा बलि महाराज सरीखे उनके भक्तों की भी पुण्यश्लोक अर्थात् करुणा बढ़ाने वाले श्लोकों के रूप में आराधना की जाती है। More | 53 min 34 sec | |||
3 . श्लोक १९ और श्लोक २० स्कन्ध ५ अद्याय २४ - गुडकेश प्रभुजीश्लोक १९ - कभी गलती से यह नहीं समझना चाहिए कि भक्ति के परिणामस्वरूप किसी भक्त को सांसारिक ऐश्वर्य प्राप्त होता है। भक्ति का असली फल तो श्रीभगवान् के प्रति शुद्ध प्रेम जागृत होना है जो समस्त परिस्थितियों में बना रहता है। श्लोक २० - ह आवश्यक नहीं है कि श्रीभगवान् की भक्ति करने के पूर्व मनुष्य को अपनी सारी सम्पत्ति उन्हें अर्पित की जाये और बन्धनमुक्त हो लिया जाये। More | 58 min 23 sec | |||
4 . श्लोक २१ स्कन्ध ५ अद्याय २४ - जितमित्र प्रभुजीश्लोक २१ - श्रीभगवान् बलि महाराज के द्वारपाल इसलिए नहीं बने कि उन्होंने अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया था, वरन् इसलिए कि वे प्रेमी के रूप में उच्चपद सिद्धि प्राप्त कर चुके थे। More | 50 min 04 sec | |||
5 . श्लोक २२ स्कन्ध ५ अद्याय २४ - राधा श्यामसुंदर प्रभुजीश्लोक २२ - दो प्रकार के ऐश्वर्य होते हैं-एक वह जो कर्मों से जनित है और भौतिक है तथा जबकि दूसरा आध्यात्मिक है। शरणागत जीव जो श्रीभगवान् पर पूर्णतः आश्रित होता है इन्द्रियभोग के लिए भौतिक ऐश्वर्य की कामना नहीं करता। More | 55 min 00 sec | |||
6 . श्लोक २३ और श्लोक २४ स्कन्ध ५ अद्याय २४ - नवद्वीप प्रभुजीश्लोक २3 - जब श्रीभगवान् को बलि महाराज का सर्वस्व ले लेने की कोई युक्ति न सूझी तो उन्होंने भिक्षा माँगने के बहाने तीनों लोक माँग लिए। इस प्रकार उनका शरीरमात्र शेष बच रहा, किन्तु तो भी भगवान् सन्तुष्ट नहीं हुए। उन्होंने बलि महाराज को वरुण पाश से बन्दी बना लिया और एक पर्वत की गुफा में ले जाकर फेंक दिया। यद्यपि बलि महाराज का सर्वस्व ले लिया गया था और उन्हें बन्दी बना कर गुफा में डाल दिया गया था, तो भी महान् भक्त होने के कारण वे इस प्रकार बोले। श्लोक २4 - बलि महाराज इतने शक्तिशाली थे कि उन्होंने इन्द्र से युद्ध करके तीनों लोकों पर अपना आधिपत्य जमा लिया था। इन्द्र निश्चय ही अत्यन्त बुद्धिमान था, फिर भी उसने भगवान् वामनदेव से उनकी भक्ति में संलग्न होने की बात न कह कर अपने लिए ऐसे धन-धान्य की याचना की जो एक मन्वन्तर में समाप्त हो जाता है। मनु की आयु बहत्तर युग आँकी गई है। एक युग में ४३,००,००० वर्ष होते हैं, अतः मनु का जीवनकाल ३०,९६,००,००० वर्ष हुआ। देवताओं का भौतिक ऐश्वर्य एक मन्वन्तर तक ही रहता है। काल दुस्तर है! नियत काल, भले ही लाखों वर्ष क्यों न हो, तुरन्त बीत जाता है। देवताओं का ऐश्वर् More | 47 min 23 sec | |||
7 . श्लोक २५ स्कन्ध ५ अद्याय २४ - नवद्वीप प्रभुजीश्लोक २5 - श्री चैतन्य महाप्रभु का उपदेश है कि शुद्ध भक्त अपने को परमेश्वर के दास का भी दास माने ( गोपीभर्तुः पादकमलयोर् दासदासानुदासः )। वैष्णव दर्शन में किसी को प्रत्यक्ष दास नहीं बनना चाहिए। प्रह्लाद महाराज को इस संसार में ऐश्वर्यपूर्ण पद तथा ब्रह्म में तदाकार होने की स्वच्छन्दता जैसे आशीर्वाद प्राप्त थे, किन्तु उन्होंने इन्हें अस्वीकार कर दिया। उन्होंने भगवान् के दासों के भी दास की सेवा में रत रहना श्रेयस्कर समझा। इसलिए बलि महाराज ने कहा है कि चूंकि उनके पितामह प्रह्लाद महाराज ने भौतिक ऐश्वर्य तथा बन्धन से मुक्ति जैसे श्रीभगवान् के आशीर्वादों को नकार दिया था, इसलिए वे आत्महित को भलीभाँति समझते थे। More | 53 min 49 sec | |||
8 . श्लोक २६ स्कन्ध ५ अद्याय २४ - नवद्वीप प्रभुजीश्लोक २6 - कहा जाता है कि आत्म-साक्षात्कार के लिए मनुष्य को भगवान् ब्रह्माजी, देवर्षि नारद, शिवजी तथा प्रह्लाद महाराज जैसे महापुरुषों का अनुसरण करना चाहिए। यदि पूर्ववर्ती आचार्यों तथा विद्वानों के पदचिह्नों पर चला जाये तो भक्ति का मार्ग बिल्कुल ही कठिन नहीं है, किन्तु जो प्रकृति के गुणों के द्वारा भौतिक दृष्टि से कलुषित हो चुके है उनके लिए उस मार्ग पर चल पाना कठिन है। यद्यपि बलि महाराज अपने पितामह के पदचिह्नों का अनुसरण कर रहे थे, किन्तु अपनी विनयशीलतावश सोच रहे थे कि वे ऐसा नहीं कर रहे हैं। भक्ति के नियमों का पालन करने वाले सिद्ध भक्तों की यह विशेषता है कि अपने को सामान्य व्यक्ति समझते हैं। यह विनयशीलता का कृत्रिम दिखावा नहीं है; एक वैष्णव वास्तव में इसी प्रकार सोचता है, और अपने को परम पद पर कभी नहीं मानता। More | 47 min 07 sec | |||
9 . श्लोक २७ स्कन्ध ५ अद्याय २४ - पुरुषोत्तम प्रभुजीश्लोक 27 - शुकदेव गोस्वामी बोले-हे राजन्, भला मैं बलि महाराज के चरित्र का कैसे गुणगान कर सकता हूँ? तीनों लोकों के स्वामी श्रीभगवान्, जो अपने भक्त पर अत्यन्त दयालु हैं, महाराज बलि के द्वार पर गदा धारण किये खड़े रहते हैं। जब पराक्रमी असुर रावण बलि महाराज पर विजय पाने के लिए आया तो वामनदेव ने उसे अपने पैर के अँगूठे से अस्सी हजार मील दूरी पर फेंक दिया। मैं बलि महाराज के चरित्र तथा कार्यकलापों का विस्तृत वर्णन आगे (आठवें स्कंध में) करूंगा। More | 55 min 57 sec | |||
10 . श्लोक १ स्कन्ध ५ अद्याय २५ - मधुह प्रभुजीश्लोक 1 - मायावादी दार्शनिकों की तरह ही मनुष्यों का एक वर्ग है जो अहं ब्रह्मास्मि तथा सोऽहं वैदिक मन्त्रों का अर्थ ''मैं ही परब्रह्म हूँ" तथा "मैं ईश्वर से अभिन्न हूँ'' लगाता है। इस प्रकार की झूठी विचारधारा एक प्रकार का मोह है। इसका वर्णन श्रीमद्भागवत (५.५.८) में जनस्य मोहोऽयमहं ममेति के रूप में हुआ है। More | 46 min 03 sec |
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