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श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय १२

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय १२

Duration

1hr 11m

Language

Hindi

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Category

Devotional

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इस शो में हम आपको श्रीमद्‍भगवद्‍गीता के बारहवें अध्याय के श्लोक सुनाएंगे और उनके मतलब समझाएंगे।

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श्लोक १

1 - श्लोक १

03 min 18 sec

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श्लोक २

2 - श्लोक २

05 min 52 sec

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श्लोक ३ - ४

3 - श्लोक ३ - ४

04 min 01 sec

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श्लोक ५

4 - श्लोक ५

05 min 18 sec

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श्लोक ६ - ७

5 - श्लोक ६ - ७

06 min 36 sec

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श्लोक ८

6 - श्लोक ८

03 min 28 sec

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श्लोक ९

7 - श्लोक ९

03 min 51 sec

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श्लोक १०

8 - श्लोक १०

04 min 43 sec

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श्लोक ११

9 - श्लोक ११

03 min 29 sec

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श्लोक १२

10 - श्लोक १२

04 min 10 sec

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श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय १२

Devotional|Hindi|15 Episodes
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About Show

इस शो में हम आपको श्रीमद्‍भगवद्‍गीता के बारहवें अध्याय के श्लोक सुनाएंगे और उनके मतलब समझाएंगे।

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EpisodesDuration
श्लोक १

1 . श्लोक १

"एवम्, सततयुक्ताः, ये, भक्ताः, त्वाम्, पर्युपासते, ये, च, अपि, अक्षरम्, अव्यक्तम्, तेषाम्, के, योगवित्तमाः" जो भक्तजन पूर्र्वोंक्त प्रकार से निरंन्तर आपके भजन-ध्यान में लगे रहकर आप और दूसरे जो केवल अविनाशी सच्चिदानन्दघन अदृश को भी अतिश्रेष्ठ भाव से भजते हैं उन दोनों प्रकार के उपासकों में अति उत्तम योगवेता अर्थात् यथार्थ रूप से भक्ति विधि को जानने वाला कौन हैं?

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03 min 18 sec

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श्लोक २

2 . श्लोक २

"मयि, आवेश्य, मनः, ये, माम्, नित्ययुक्ताः, उपासते, श्रद्धया, परया, उपेताः, ते, मे, युक्ततमाः, मताः" मुझमें मन को एकाग्र करके निरन्तर मेरे भजन ध्यान में लगे हुए जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त होकर मुझे भजते हैं, वे मुझको साधकों में अति उत्तम मान्य है ये मेरे विचार हैं।

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05 min 52 sec

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श्लोक ३ - ४

3 . श्लोक ३ - ४

"ये, तु, अक्षरम्, अनिर्देश्यम्, अव्यक्तम्, पर्युपासते, सर्वत्रगम्, अचिन्त्यम्, च, कूटस्थम्, अचलम्, ध्रुवम् सन्नियम्य, इन्द्रियग्रामम्, सर्वत्र, समबुद्धयः, ते, प्राप्नुवन्ति, माम्, एव, सर्वभूतहिते, रताः" परंतु जो इन्द्रियों के समुदाय को भली प्रकार से वशमें करके मन-बुद्धिसे परे, अर्थात् तत्वज्ञान के अभाव से सर्वव्यापी और सदा एक रस रहने वाले नित्य अचल अदृश अविनाशी परमात्मा को शास्त्रों के निर्देश के विपरीत अर्थात् शास्त्रविधि त्यागकर निरंतर एकी भाव से ध्यान करते हुए भजते हैं वे सम्पूर्ण भूतों के हितमें रत और सबमें समान भाव वाले योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं।

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श्लोक ५

4 . श्लोक ५

"क्लेशः, अधिकतरः, तेषाम्, अव्यक्तासक्तचेतसाम्, अव्यक्ता, हि, गतिः, दुःखम्, देहवद्भिः, अवाप्यते" उन अदृश ब्रह्म में आसक्तचित्त वाले पुरुषों के साधन में वाद-विवाद रूपी क्लेश अर्थात् कष्ट विशेष है क्योंकि देहाभिमानियों के द्वारा अव्यक्तविषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है।

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05 min 18 sec

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श्लोक ६ - ७

5 . श्लोक ६ - ७

"ये, तु, सर्वाणि, कर्माणि, मयि, सóयस्य, मत्पराः, अनन्येन, एव, योगेन, माम्, ध्यायन्तः, उपासते तेषाम्, अहम्, समुद्धत्र्ता, मृत्युसंसारसागरात्, भवामि, नचिरात्, पार्थ, मयि, आवेशितचेतसाम्" परंतु जो मतावलम्बी मेरे परायण रहने वाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके मुझ सगुणरूप परमेश्वर को ही अनन्य भक्ति योग से निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं। हे अर्जुन! उन मुझमें चित्त लगाने वाले प्रेमी भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्युरूप संसार समुद्र से उद्धार करने वाला होता हूँ।

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06 min 36 sec

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श्लोक ८

6 . श्लोक ८

"मयि, एव, मनः, आधत्स्व, मयि, बुद्धिम् निवेशय, निवसिष्यसि, मयि, एव, अतः, ऊध्र्वम्, न, संशयः"

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श्लोक ९

7 . श्लोक ९

"अथ, चित्तम्, समाधातुम्, न, शक्नोषि, मयि, स्थिरम्, अभ्यासयोगेन, ततः, माम्, इच्छ, आप्तुम्, धनंजय"

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03 min 51 sec

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श्लोक १०

8 . श्लोक १०

"अभ्यासे, अपि, असमर्थः, असि, मत्कर्मपरमः, भव, मदर्थम्, अपि, कर्माणि, कुर्वन्, सिद्धिम्, अवाप्स्यसि"

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04 min 43 sec

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श्लोक ११

9 . श्लोक ११

"अथ, एतत्, अपि, अशक्तः, असि, कर्तुम्, मद्योगम्, आश्रितः, सर्वकर्मफलत्यागम्, ततः, कुरु, यतात्मवान्"

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03 min 29 sec

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श्लोक १२

10 . श्लोक १२

"श्रेयः, हि, ज्ञानम्, अभ्यासात्, ज्ञानात्, ध्यानम्, विशिष्यते, ध्यानात्, कर्मफलत्यागः, त्यागात्, शान्तिः, अनन्तरम्"

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04 min 10 sec

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