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श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय १७

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय १७

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0hr 45m

Language

Hindi

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Devotional

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इस शो में हम आपको श्रीमदभगवद्गगीता के सत्रहवें अध्याय के श्लोक सुनाएंगे और उनके मतलब समझाएंगे।

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श्लोक १

1 - श्लोक १

02 min 41 sec

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श्लोक  २, श्लोक  ३

2 - श्लोक २, श्लोक ३

02 min 59 sec

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श्लोक   ४

3 - श्लोक ४

04 min 18 sec

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श्लोक  ५, श्लोक  ६

4 - श्लोक ५, श्लोक ६

04 min 03 sec

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श्लोक  ७

5 - श्लोक ७

01 min 58 sec

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श्लोक ८ , श्लोक ९ और श्लोक १०

6 - श्लोक ८ , श्लोक ९ और श्लोक १०

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श्लोक  ११, श्लोक १२ और श्लोक १३

7 - श्लोक ११, श्लोक १२ और श्लोक १३

03 min 41 sec

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श्लोक  १४, श्लोक १५ और श्लोक १६

8 - श्लोक १४, श्लोक १५ और श्लोक १६

04 min 43 sec

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श्लोक  १७, श्लोक १८ और श्लोक १९

9 - श्लोक १७, श्लोक १८ और श्लोक १९

04 min 35 sec

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श्लोक  २०, श्लोक २१  और श्लोक २२

10 - श्लोक २०, श्लोक २१ और श्लोक २२

04 min 13 sec

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श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय १७

Devotional|Hindi|12 Episodes
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इस शो में हम आपको श्रीमदभगवद्गगीता के सत्रहवें अध्याय के श्लोक सुनाएंगे और उनके मतलब समझाएंगे।

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श्लोक १

1 . श्लोक १

"ये, शास्त्राविधिम्, उत्सृृज्य, यजन्ते, श्रद्धया, अन्विताः, तेषाम्, निष्ठा, तु, का, कृष्ण, सत्त्वम्, आहो, रजः, तमः।।1।।"

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श्लोक  २, श्लोक  ३

2 . श्लोक २, श्लोक ३

"(भगवान उवाच) त्रिविधा, भवति, श्रद्धा, देहिनाम्, सा, स्वभावजा, सात्त्विकी, राजसी, च, एव, तामसी, च, इति, ताम्, श्रृृणु।।2।।" "त्याज्यम्, दोषवत्, इति, एके, कर्म, प्राहुः, मनीषिणः, यज्ञदानतपःकर्म, न, त्याज्यम्, इति, च, अपरे।।3।।"

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श्लोक   ४

3 . श्लोक ४

"यजन्ते, सात्त्विकाः, देवान्, यक्षरक्षांसि, राजसाः, प्रेतान्, भूतगणान्, च, अन्ये, यजन्ते, तामसाः, जनाः।।4।।"

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04 min 18 sec

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श्लोक  ५, श्लोक  ६

4 . श्लोक ५, श्लोक ६

"अशास्त्रविहितम्, घोरम्, तप्यन्ते, ये, तपः, जनाः, दम्भाहंकारसंयुक्ताः, कामरागबलान्विताः।।5।। कर्शयन्तः, शरीरस्थम्, भूतग्रामम्, अचेतसः, माम्, च, एव, अन्तःशरीरस्थम्, तान्, विद्धि, आसुरनिश्चयान्।।6।।"

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श्लोक  ७

5 . श्लोक ७

"आहारः, तु, अपि, सर्वस्य, त्रिविधः, भवति, प्रियः, यज्ञः, तपः, तथा, दानम्, तेषाम्, भेदम्, इमम्, श्रृणु।।7।।"

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श्लोक ८ , श्लोक ९ और श्लोक १०

6 . श्लोक ८ , श्लोक ९ और श्लोक १०

"आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः, रस्याः, स्निग्धाः, स्थिराः, हृद्याः, आहाराः, सात्त्विकप्रियाः।।8।। कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः, आहाराः, राजसस्य, इष्टाः, दुःखशोकामयप्रदाः।।9।। यातयामम्, गतरसम्, पूति, पर्युषितम्, च, यत्, उच्छिष्टम्, अपि, च अमेध्यम्, भोजनम्, तामसप्रियम्।।10।।"

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श्लोक  ११, श्लोक १२ और श्लोक १३

7 . श्लोक ११, श्लोक १२ और श्लोक १३

"अफलाकाङ्क्षिभिः, यज्ञः, विधिदृष्टः, यः, इज्यते, यष्टव्यम्, एव, इति, मनः, समाधाय, सः, सात्त्विकः।।11।। अभिसन्धाय, तु, फलम्, दम्भार्थम्, अपि, च, एव, यत्, इज्यते, भरतश्रेष्ठ, तम्, यज्ञम्, विद्धि, राजसम्।।12।। विधिहीनम्, असृृष्टान्नम्, मन्त्राहीनम्, अदक्षिणम्, श्रद्धाविरहितम्, यज्ञम्, तामसम्, परिचक्षते।।13।।"

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श्लोक  १४, श्लोक १५ और श्लोक १६

8 . श्लोक १४, श्लोक १५ और श्लोक १६

"देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनम्, शौचम्, आर्जवम्, ब्रह्मचर्यम्, अहिंसा, च, शारीरम्, तपः, उच्यते।।14।। अनुद्वेगकरम्, वाक्यम्, सत्यम्, प्रियहितम्, च, यत्, स्वाध्यायाभ्यसनम्, च, एव, वाङ्मयम्, तपः, उच्यते।।15।। मनः प्रसादः, सौम्यत्वम्, मौनम्, आत्मविनिग्रहः, भावसंशुद्धिः, इति, एतत्, तपः, मानसम्, उच्यते।।16।। "

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श्लोक  १७, श्लोक १८ और श्लोक १९

9 . श्लोक १७, श्लोक १८ और श्लोक १९

"श्रद्धया, परया, तप्तम्, तपः, तत्, त्रिविधम्, नरैः, अफलाकाङ्क्षिभिः, युक्तैः, सात्त्विकम्, परिचक्षते।।17।। सत्कारमानपूजार्थम्, तपः, दम्भेन, च, एव, यत्, क्रियते, तत्, इह, प्रोक्तम्, राजसम्, चलम्, अध्रुवम्।।18।। मूढग्राहेण, आत्मनः, यत्, पीडया, क्रियते, तपः, परस्य, उत्सादनार्थम्, वा, तत्, तामसम्, उदाहृतम्।।19।।"

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श्लोक  २०, श्लोक २१  और श्लोक २२

10 . श्लोक २०, श्लोक २१ और श्लोक २२

"दातव्यम्, इति, यत्, दानम्, दीयते, अनुपकारिणे, देशे, काले, च, पात्रो, च, तत्, दानम्, सात्त्विकम्, स्मृतम्।।20।। यत्, तु, प्रत्युपकारार्थम्, फलम्, उद्दिश्य, वा, पुनः, दीयते, च, परिक्लिष्टम्, तत्, दानम्, राजसम्, स्मृतम्।।21।। अदेशकाले, यत्, दानम्, अपात्रोभ्यः, च, दीयते, असत्कृतम्, अवज्ञातम्, तत्, तामसम्, उदाहृतम्।।22।।"

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