श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय ६
Duration
3hr 33m
Language
Hindi
Released
Category
Devotional
Favorite
Review
Play
Share
Read More
1 - श्लोक १
07 min 02 sec
26
Episode info
Share Episode
2 - श्लोक २
06 min 14 sec
11
Episode info
Share Episode
3 - श्लोक ३
08 min 15 sec
11
Episode info
Share Episode
4 - श्लोक ४
05 min 42 sec
13
Episode info
Share Episode
5 - श्लोक ५
07 min 18 sec
12
Episode info
Share Episode
6 - श्लोक ६
07 min 30 sec
9
Episode info
Share Episode
7 - श्लोक ७
07 min 07 sec
9
Episode info
Share Episode
8 - श्लोक ८
11 min 44 sec
7
Episode info
Share Episode
9 - श्लोक ९
07 min 30 sec
6
Episode info
Share Episode
10 - श्लोक १०
05 min 16 sec
8
Episode info
Share Episode
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय ६
About Show
| Episodes | Duration | |||
1 . श्लोक १जो साधक कर्मफल का आश्रय न लेकर शास्त्र विधि अनुसार करने योग्य भक्ति कर्म करता है, वह सन्यासी अर्थात् शास्त्र विरुद्ध साधना कर्मों को त्यागा हुआ व्यक्ति तथा योगी अर्थात् भक्त है और वासना रहित नहीं है तथा केवल एक स्थान पर बैठ कर विशेष आसन आदि लगा कर लोक दिखावा करके क्रियाओं का त्याग करने वाला भी योगी नहीं है। भावार्थ है कि जो हठ योग करके दम्भ करता है मन में विकार है, ऊपर से निष्क्रिय दिखता है वह न सन्यासी है, न ही कर्मयोगी अर्थात् भक्त है। More | 07 min 02 sec | |||
2 . श्लोक २हे अर्जुन! जिसको सन्यास ऐसा कहते हैं उस भक्ति ज्ञान योग को जान, क्योंकि संकल्पों का त्याग न करनेवाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता। More | 06 min 14 sec | |||
3 . श्लोक ३योग अर्थात् भक्ति में आरूढ़ होने की इच्छावाले मननशील साधक के लिये शास्त्र अनुकूल भक्ति कर्म करना ही हेतु अर्थात् भक्ति का उद्देश्य कहा जाता है उस भक्ति में संलग्न साधक का जो सर्वसंकल्पों का अभाव है वही वास्तव में भक्ति करने का कारण अर्थात् हेतु कहा जाता है। More | 08 min 15 sec | |||
4 . श्लोक ४जिस समय में न तो इन्द्रियों के भोगों में और न कर्मों में ही आसक्त होता है, उस स्थिति में सर्वसंकल्पों का त्यागी पुरुष वास्तव में भक्ति में दृढ़ निश्चय से संलग्न कहा जाता है। More | 05 min 42 sec | |||
5 . श्लोक ५पूर्ण परमात्मा जो आत्मा के साथ अभेद रूप में रहता है के तत्वज्ञान को ध्यान में रखते हुए शास्त्र अनुकूल साधना से अपने द्वारा अपनी आत्मा का उद्धार करे और अपने को बर्बाद न करे क्योंकि शास्त्र अनुकूल साधक को पूर्ण परमात्मा विशेष लाभ प्रदान करता है वही प्रभु आत्मा के साथ अभेद रूप में रहता है, इसलिए वह आत्मरूप परमात्मा वास्तव में आत्मा का मित्र है और शास्त्र विधि को त्याग कर मनमाना आचरण करने से जीवात्मा वास्तव में स्वयं का शत्रु है। More | 07 min 18 sec | |||
6 . श्लोक ६जो आत्मा शास्त्रानुकूल साधना करता है उसका पूर्ण परमात्मा ही साथी है जिस कारण से वास्तव में शास्त्र अनुकूल साधक की आत्मा के साथ पूर्ण परमात्मा की शक्ति विशेष कार्य करती है जैसे बिजली का कनेक्शन लेने पर मानव शक्ति से न होने वाले कार्य भी आसानी से हो जाते हैं। ऐसे पूर्ण परमात्मा से जीवात्मा की विजय होती है अर्थात् सर्व कार्य सिद्ध तथा सर्व सुख प्राप्त होता है तथा परमगति को अर्थात् पूर्ण मोक्ष प्राप्त करता है तथा मन व इन्द्रियों पर भी वही विजय प्राप्त करता है। परन्तु इसके विपरीत जो शास्त्र अनुकूल साधना नहीं करते उनकी आत्मा को पूर्ण प्रभु का विशेष सहयोग प्राप्त नहीं होता, वह केवल कर्म संस्कार ही प्राप्त करता रहता है इसलिए पूर्ण प्रभु के सहयोग रहित जीवात्मा स्वयं दुश्मन जैसा व्यवहार करता है वास्तव में वह साधक अपना ही शत्रु तुल्य है अर्थात् शास्त्र विधि को त्याग कर मनमाना आचरण अर्थात् मनमुखी पूजायें करने वाले को न तो सुख प्राप्त होता है न ही कार्य सिद्ध होता है, न परमगति ही प्राप्त होती है। More | 07 min 30 sec | |||
7 . श्लोक ७वह परमात्मा के कृपा पात्र विजयी आत्मा अर्थात् शास्त्र अनुकूल साधना करने से प्रभु से सर्व सुख व कार्य सिद्धि प्राप्त हो रही है वह पूर्ण संतुष्ट साधक पूर्ण प्रभु के ऊपर पूर्ण रूपेण आश्रित है अर्थात् उसको किसी अन्य से लाभ की चाह नहीं रहती। वह तो सर्दी व गर्मी अर्थात् सुख व दुःख में तथा मान व अपमान में भी प्रभु की इच्छा जान कर ही निश्चिंत रहता है। More | 07 min 07 sec | |||
8 . श्लोक ८जिसका अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञान अर्थात् तत्वज्ञान से तृप्त है जिसकी जीवात्मा की स्थिति विकार रहित है प्रभु के सहयोग से जिसकी इन्द्रियाँ भलीभाँति जीती हुई हैं और जिसके लिये मिट्टी पत्थर और सुवर्ण समान हैं वह शास्त्र अनुकूल साधक युक्त अर्थात् भगवत्प्राप्त है यह अन्तिम ठीक सही भक्ति करने वाला कहा जाता है। More | 11 min 44 sec | |||
9 . श्लोक ९सुहृद्, मित्र, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष और बन्धुगणों में धर्मात्माओं में और पापियों में भी समान भाव रखनेवाला अत्यन्त श्रेष्ठ है। More | 07 min 30 sec | |||
10 . श्लोक १०मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वश में रखनेवाला आशा रहित और संग्रह रहित साधक अकेला ही एकान्त स्थान में रहता है तथा स्थित होकर आत्मा को निरन्तर परमात्मा में लगावे। More | 05 min 16 sec |
Recommended shows
You may also like
S1E1: D'Evil
सुन्दरकाण्ड
ॐ નમઃ શિવાય - ધૂન
हिरण्यकश्यप की तपस्या
Leh : A Beauty that Scares! Part 1
SIDDHHAKUNJIKA STOTRA WITH ARTH











