श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय ८
Duration
1hr 56m
Language
Hindi
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Category
Devotional
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1 - श्लोक १
03 min 49 sec
14
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2 - श्लोक २
07 min 04 sec
11
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3 - श्लोक ३
05 min 56 sec
9
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4 - श्लोक ४
04 min 53 sec
7
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5 - श्लोक ५
03 min 14 sec
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6 - श्लोक ६
04 min 24 sec
8
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7 - श्लोक ७
03 min 35 sec
6
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8 - श्लोक ८
02 min 58 sec
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9 - श्लोक ९
03 min 39 sec
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10 - श्लोक १०
02 min 56 sec
5
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श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय ८
About Show
| Episodes | Duration | |||
1 . श्लोक १"किम्, तत्, ब्रह्म, किम्, अध्यात्मम्, किम्, कर्म, पुरुषोत्तम्, अधिभूतम्, च, किम्, प्रोक्तम्, अधिदैवम्, किम्, उच्यते" हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत नाम से क्या कहा गया है और अधिदैव किसको कहते हैं? More | 03 min 49 sec | |||
2 . श्लोक २"अधियज्ञः, कथम्, कः, अत्र, देहे, अस्मिन्, मधुसूदन, प्रयाणकाले, च, कथम्, ज्ञेयः, असि, नियतात्मभिः" हे मधुसूदन! यहाँ अधियज्ञ कौन है और वह इस शरीर में कैसे है? तथा युक्त चितवाले पुरुषों द्वारा अन्त समय में किस प्रकार जानने में आते हैं। More | 07 min 04 sec | |||
3 . श्लोक ३"अक्षरम्, ब्रह्म, परमम्, स्वभावः, अध्यात्मम्, उच्यते, भूतभावोद्भवकरः, विसर्गः, कर्मस×िज्ञतः" गीता ज्ञान दाता ब्रह्म भगवान ने उत्तर दिया वह परम अक्षर ‘ब्रह्म‘ है जो जीवात्मा के साथ सदा रहने वाला है उसी का स्वरूप अर्थात् परमात्मा जैसे गुणों वाली जीवात्मा ‘अध्यात्म‘ नाम से कहा जाता है तथा जीव भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है वह ‘कर्म‘ नाम से कहा गया है। More | 05 min 56 sec | |||
4 . श्लोक ४"अधिभूतम्, क्षरः, भावः, पुरुषः, च, अधिदैवतम्, अधियज्ञः, अहम्, एव, अत्र, देहे, देहभृताम्, वर।" इस देह धारियों में श्रेष्ठ अर्थात् मानव शरीर में नाश्वान स्वभाव वाले अधिभूत जीव का स्वामी और अधिदैव दैवी शक्ति का स्वामी यज्ञ का स्वामी अर्थात् यज्ञ में प्रतिष्ठित अधियज्ञ पूर्ण परमात्मा है इसी प्रकार इस मानव शरीर में मैं हूँ। More | 04 min 53 sec | |||
5 . श्लोक ५"अन्तकाले, च, माम्, एव, स्मरन्, मुक्त्वा, कलेवरम्, यः, प्रयाति, सः, मद्भावम्, याति, न, अस्ति, अत्र, संशयः" जो अन्तकाल में भी मुझको ही सुमरण करता हुआ शरीर को त्यागकर जाता है वह शास्त्रनुकूल भक्ति ब्रह्म तक की साधना के भाव को अर्थात् स्वभाव को प्राप्त होता है इसमें कुछ भी संशय नहीं है। More | 03 min 14 sec | |||
6 . श्लोक ६"यम्, यम्, वा, अपि, स्मरन्, भावम्, त्यजति, अन्ते, कलेवरम्, तम्, तम्, एव, एति, कौन्तेय, सदा, तद्भावभावितः" इसलिये हे अर्जुन! तू सब समय में निरन्तर मेरा सुमरण कर और युद्ध भी कर इस प्रकार मुझमें अर्पण किये हुए मन-बुद्धि से युक्त होकर तू निःसन्देह मुझको ही प्राप्त होगा अर्थात् जब कभी तेरा मनुष्य का जन्म होगा मेरी साधना पर लगेगा तथा मेरे पास ही रहेगा। More | 04 min 24 sec | |||
7 . श्लोक ७"तस्मात्, सर्वेषु, कालेषु, माम्, अनुस्मर, युध्य, च, मयि, अर्पितमनोबुद्धिः, माम्, एव, एष्यसि, असंशयम्" इसलिये हे अर्जुन! तू सब समय में निरन्तर मेरा सुमरण कर और युद्ध भी कर इस प्रकार मुझमें अर्पण किये हुए मन-बुद्धि से युक्त होकर तू निःसन्देह मुझको ही प्राप्त होगा अर्थात् जब कभी तेरा मनुष्य का जन्म होगा मेरी साधना पर लगेगा तथा मेरे पास ही रहेगा। More | 03 min 35 sec | |||
8 . श्लोक ८"अभ्यासयोगयुक्तेन, चेतसा, नान्यगामिना। परमम्, पुरुषम्, दिव्यम्, याति, पार्थ, अनुचिन्तयन्" हे पार्थ! परमेश्वर के नाम जाप के अभ्यास रूप योग से युक्त अर्थात् उस पूर्ण परमात्मा की पूजा में लीन दूसरी ओर न जाने वाले चित्त से निरन्तर चिन्तन करता हुआ भक्त परम दिव्य परमात्मा को अर्थात् परमेश्वर को ही प्राप्त होता है। More | 02 min 58 sec | |||
9 . श्लोक ९"कविम्, पुराणम् अनुशासितारम्, अणोः, अणीयांसम्, अनुस्मरेत्, यः, सर्वस्य, धातारम्, अचिन्त्यरूपम्, आदित्यवर्णम्, तमसः, परस्तात्" कविर्देव, अर्थात् कबीर परमेश्वर जो कवि रूप से प्रसिद्ध होता है वह अनादि, सबके नियन्ता सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म, सबके धारण-पोषण करने वाले अचिन्त्य-स्वरूप सूर्य के सदृश नित्य प्रकाशमान है। जो उस अज्ञानरूप अंधकार से अति परे सच्चिदानन्दघन परमेश्वर का सुमरण करता है। More | 03 min 39 sec | |||
10 . श्लोक १०"प्रयाणकाले, मनसा, अचलेन, भक्त्या, युक्तः, योगबलेन, च, एव, भ्रुवोः, मध्ये, प्राणम्, आवेश्य, सम्यक्, सः, तम्, परम् पुरुषम्, उपैति, दिव्यम्" वह भक्तियुक्त साधक अन्तकाल में नाम के जाप की भक्ति के प्रभाव से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके फिर निश्चल मन से अज्ञात दिव्यरूप परम भगवान को ही प्राप्त होता है। More | 02 min 56 sec |
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