राहत इंदौरी के रंग
Duration
0hr 32m
Language
Hindi
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Category
Entertainment
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1 - दरमियाँ एक ज़माना रखा जाए
02 min 34 sec
10
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2 - धूप समंदर चेहरा है
02 min 27 sec
4
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3 - दीये जलाये तो अंजाम क्या हुआ मेरा
03 min 45 sec
2
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4 - दांव पर मैं भी, दांव पर तू भी
02 min 46 sec
1
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5 - अपने होने का हम इस तरह पता देते थे
02 min 49 sec
2
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6 - बैठे-बैठे कोई ख़्याल आया
02 min 24 sec
1
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7 - ज़िन्दगी भर दूर रहने की सज़ाएं रह गयी
02 min 00 sec
0
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8 - मुआफ़िक जो फ़ज़ा तैयार की है
03 min 09 sec
1
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9 - पहली शर्त जुदाई है
03 min 13 sec
1
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10 - पुराने शहरों के मंज़र निकलने लगते हैं
02 min 49 sec
2
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राहत इंदौरी के रंग
About Show
| Episodes | Duration | |||
1 . दरमियाँ एक ज़माना रखा जाएशो के पहले एपिसोड में सुनिये राहत इंदौरी साहब की सबसे बेहतरीन नज़्मों में से एक 'दरमियाँ' एक ज़माना रखा जाए' More | 02 min 34 sec | |||
2 . धूप समंदर चेहरा हैइस एपिसोड में सुनिये राहत इंदौरी साहब की एक विचारशील कविता 'धूप समंदर चेहरा है' More | 02 min 27 sec | |||
3 . दीये जलाये तो अंजाम क्या हुआ मेराइस एपिसोड में सुनिये राहत इंदौरी साहब की एक और खूबसूरत कविता 'दीये जलाये तो अंजाम क्या हुआ मेरा' More | 03 min 45 sec | |||
4 . दांव पर मैं भी, दांव पर तू भीइस एपिसोड में सुनिये राहत इंदौरी साहब की और मशहूर कविता 'दांव पर मैं भी, दांव पर तू भी' More | 02 min 46 sec | |||
5 . अपने होने का हम इस तरह पता देते थेइस एपिसोड में सुनिये राहत इंदौरी साहब की कविता 'अपने होने का हम इस तरह पता देते थे' More | 02 min 49 sec | |||
6 . बैठे-बैठे कोई ख़्याल आयाइस एपिसोड में सुनिये राहत इंदौरी साहब की कविता 'बैठे-बैठे कोई ख़्याल आया' More | 02 min 24 sec | |||
7 . ज़िन्दगी भर दूर रहने की सज़ाएं रह गयीइस एपिसोड में सुनिये राहत इंदौरी साहब की कविता 'ज़िन्दगी भर दूर रेहने की सज़ाएं रह गयी' जो ज़िन्दगी जीने के फ़ल्सफ़ों के बारे में बात करती है. More | 02 min 00 sec | |||
8 . मुआफ़िक जो फ़ज़ा तैयार की हैइस एपिसोड में सुनिये राहत इंदौरी साहब की कविता 'मुआफ़िक जो फ़ज़ा तैयार की है.' More | 03 min 09 sec | |||
9 . पहली शर्त जुदाई हैइस एपिसोड में सुनिये राहत इंदौरी साहब की कविता 'पहली शर्त जुदाई है' More | 03 min 13 sec | |||
10 . पुराने शहरों के मंज़र निकलने लगते हैंइस एपिसोड में सुनिये राहत इंदौरी साहब की कविता 'पुराने शहरों के मंज़र निकलने लगते हैं' More | 02 min 49 sec |
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