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रंग-ए-ग़ज़ल - ग़ज़लों की दुनिया सीजन 4

रंग-ए-ग़ज़ल - ग़ज़लों की दुनिया सीजन 4

Duration

0hr 51m

Language

Urdu

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Category

Urdu Shows

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"ग़ज़लें झऱने की तरह होती हैं। जिस तरह झरने से ठंडा पानी बहता है, उसी तरह ग़ज़लों से शायरों के दिल में छिपी भावनाएं बहती हैं। अपनी भावनाओं को बताने के लिए अक्सर शायर गहराई से भरे अल्फ़ाज़ों का इस्तेमाल करते हैं। और इन्ही अल्फ़ाज़ों को एक साथ एक ही धागे में पिरोकर शायर ग़ज़लें तैयार करते हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि जितना पुराना उर्दू साहित्य का इतिहास है, उतना ही पुराना ग़ज़लों का भी इतिहास है। हर मूड में सुनी जाने वाली ग़ज़लों के इस शो 'रंग-ए-ग़ज़ल सीजन 4 ' में आपका स्वागत है। इस शो में हम आपके लिए सभी दिग्गज शायरों की एक से एक ग़ज़लें लेकर आए हैं। """

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इमाम बक़्श नासीख़ - जान हम तुझपे दिया करते हैं

1 - इमाम बक़्श नासीख़ - जान हम तुझपे दिया करते हैं

04 min 49 sec

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इब्न-ए-इंशा - कुछ कहने का वक़्त नहीं ये

2 - इब्न-ए-इंशा - कुछ कहने का वक़्त नहीं ये

04 min 45 sec

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हैदर अली आतिश - सुन तो सही जहाँ में है तेरा फ़साना क्या

3 - हैदर अली आतिश - सुन तो सही जहाँ में है तेरा फ़साना क्या

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हफ़ीज़ जालंधरी - कोई चारा नहीं दुआ के सिवा

4 - हफ़ीज़ जालंधरी - कोई चारा नहीं दुआ के सिवा

05 min 03 sec

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दाग़ देहलवी - लुत्फ़ वो इश्क़ में पाए हैं कि जी जानता है

5 - दाग़ देहलवी - लुत्फ़ वो इश्क़ में पाए हैं कि जी जानता है

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7 - अकबर इलाहाबादी - आंखें मुझे तलवों से वो मलने नहीं देते

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अमीर मीनाई - ऐ ज़ब्त देख इश्क़ की उन को ख़बर न हो

8 - अमीर मीनाई - ऐ ज़ब्त देख इश्क़ की उन को ख़बर न हो

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अल्लामा इक़बाल - गेसू-ए-ताबदार को और भी ताबदार कर

9 - अल्लामा इक़बाल - गेसू-ए-ताबदार को और भी ताबदार कर

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आह संभल - कल हमारा भी गुलिस्तां में बसेरा था मगर

10 - आह संभल - कल हमारा भी गुलिस्तां में बसेरा था मगर

03 min 53 sec

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रंग-ए-ग़ज़ल - ग़ज़लों की दुनिया सीजन 4

Urdu Shows|Urdu|10 Episodes
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"ग़ज़लें झऱने की तरह होती हैं। जिस तरह झरने से ठंडा पानी बहता है, उसी तरह ग़ज़लों से शायरों के दिल में छिपी भावनाएं बहती हैं। अपनी भावनाओं को बताने के लिए अक्सर शायर गहराई से भरे अल्फ़ाज़ों का इस्तेमाल करते हैं। और इन्ही अल्फ़ाज़ों को एक साथ एक ही धागे में पिरोकर शायर ग़ज़लें तैयार करते हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि जितना पुराना उर्दू साहित्य का इतिहास है, उतना ही पुराना ग़ज़लों का भी इतिहास है। हर मूड में सुनी जाने वाली ग़ज़लों के इस शो 'रंग-ए-ग़ज़ल सीजन 4 ' में आपका स्वागत है। इस शो में हम आपके लिए सभी दिग्गज शायरों की एक से एक ग़ज़लें लेकर आए हैं। """

EpisodesDuration
इमाम बक़्श नासीख़ - जान हम तुझपे दिया करते हैं

1 . इमाम बक़्श नासीख़ - जान हम तुझपे दिया करते हैं

रंग-ए-ग़ज़ल' S4 के इस एपिसोड में सुनिए शायर इमाम बक़्श नासीख़ साहब की लिखी ग़ज़ल, जिसका नाम है 'जान हम तिझपे दिया करते हैं'।

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इब्न-ए-इंशा - कुछ कहने का वक़्त नहीं ये

2 . इब्न-ए-इंशा - कुछ कहने का वक़्त नहीं ये

रंग-ए-ग़ज़ल' S4 के इस एपिसोड में सुनिए शायर इब्न-ए-इंशा साहब की लिखी ग़ज़ल, जिसका नाम है 'कुछ कहने का वक़्त नहीं ये'।

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रंग-ए-ग़ज़ल' S4 के इस एपिसोड में सुनिए शायर दाग़ देहलवी साहब की लिखी ग़ज़ल, जिसका नाम है 'लुत्फ़ वो इश्क़ में पाए हैं कि जी जानता है'।

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