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श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय २

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय २

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6hr 5m

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Hindi

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Devotional

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इस शो में हम आपको श्रीमद्‍भगवद्‍गीता के दूसरे अध्याय के श्लोक सुनाएंगे और उनके मतलब समझाएंगे।

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श्लोक 1

1 - श्लोक 1

06 min 13 sec

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श्लोक 2

2 - श्लोक 2

08 min 11 sec

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श्लोक 3

3 - श्लोक 3

06 min 51 sec

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श्लोक 4

4 - श्लोक 4

06 min 03 sec

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श्लोक 5

5 - श्लोक 5

06 min 34 sec

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श्लोक 6

6 - श्लोक 6

07 min 09 sec

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श्लोक 7

7 - श्लोक 7

10 min 29 sec

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श्लोक 8

8 - श्लोक 8

07 min 43 sec

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श्लोक 9

9 - श्लोक 9

05 min 35 sec

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श्लोक 10

10 - श्लोक 10

06 min 53 sec

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श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय २

Devotional|Hindi|71 Episodes
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इस शो में हम आपको श्रीमद्‍भगवद्‍गीता के दूसरे अध्याय के श्लोक सुनाएंगे और उनके मतलब समझाएंगे।

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श्लोक 1

1 . श्लोक 1

"तम्, तथा, कृपया, आविष्टम्, अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्, विषीदन्तम्, इदम्, वाक्यम्, उवाच, मधुसूदनः।।" "संजय बोले, ""मधुसूदन यानी भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य वाणी में अर्जुन से तब बात की, जब वे बुरी तरह से परेशान थे और युद्ध करने के विचार से दुःखी और ग्लानि हो चुके थे।"""

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06 min 13 sec

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श्लोक 2

2 . श्लोक 2

"कुतः, त्वा, कश्मलम्, इदम्, विषमे, समुपस्थितम्, अनार्यजुष्टम्, अस्वग्र्यम्, अकीर्तिकरम्, अर्जुन।।" "श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, ""हे अर्जुन! ऐसे समय में आपका इस प्रकार दु:खी होना अनुचित है। इस प्रकार दु:खी होने से आप ना ही स्वर्ग प्राप्त कर सकेंगे और ना ही वैभव। आप जैसे श्रेष्ठ पुरुष ऐसी परिस्थितियों में उदास नहीं होते।"""

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श्लोक 3

3 . श्लोक 3

"क्लैब्यम्, मा, स्म, गमः, पार्थ, न, एतत्, त्वयि, उपपद्यते, क्षुद्रम् हृदयदौर्बल्यम्, त्यक्त्वा, उत्तिष्ठ, परन्तप।।" "आगे श्रीकृष्ण कहते हैं, ""हे अर्जुन! एक वीर, साहसी और बहादुर योद्धा बनो, कोई कायर या कमज़ोर व्यक्ति नहीं। आप जैसे महान योद्धा का अपने दुश्मनों का सामना करने और उन्हें युद्ध में पराजित करने से पीछे हटना सही नहीं है।"""

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श्लोक 4

4 . श्लोक 4

"कथम्, भीष्मम्, अहम्, सङ्ख्ये, द्रोणम्, च, मधुसूदन, इषुभिः, प्रति, योत्स्यामि, पूजार्हौ, अरिसूदन।।" "अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं, ""हे मधुसूदन! हे शत्रुहन्ता! जिन महापुरुषों की मैं पूजा करता हूँ, ऐसे पूज्यनीय भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य पर मैं युद्धभूमि में बाण कैसे चलाऊँगा?"""

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श्लोक 5

5 . श्लोक 5

"गुरून्, अहत्वा, हि, महानुभावान्, श्रेयः, भोक्तुम्, भैक्ष्यम्, अपि, इह, लोके, हत्वा, अर्थकामान्, तु, गुरून्, इह, एव, भुजीय, भोगान्, रुधिरप्रदिग्धान्,।। " "अर्जुन कहते हैं, ""मेरे गुरुओं की हत्या का आरोप अपने सिर लेकर जीने से बेहतर है कि मैं सारा जीवन भिक्षा मांगकर जी लूँ, क्योंकि उन्हें मारने के बाद मेरे पास केवल उनके खून से सने हुए धन और इच्छाओं का सुख बचेगा।"""

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श्लोक 6

6 . श्लोक 6

"न, च, एतत्, विध्मः, कतरत्, नः, गरीयः, यत्, वा, जयेम, यदि, वा, नः, जयेयुः, यान् एव, हत्वा, न, जिजीविषामः, ते, अवस्थिताः, प्रमुखे, धार्तराष्ट्राः।।" "अर्जुन भगवन से कहते हैं, ""हम नहीं जानते कि युद्ध करना सही है या नहीं और हम यह भी नहीं जानते कि हम उन पर विजय प्राप्त कर पाएंगे या नहीं। धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे खिलाफ खड़े ज़रूर हैं लेकिन उन्हें मारने के बाद हम जी नहीं पाएंगे।"" "

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श्लोक 7

7 . श्लोक 7

"कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः, पृच्छामि, त्वाम्, धर्मसम्मूढचेताः, यत्, श्रेयः, स्यात्, निश्चितम्, ब्रूहि, तत्, मे, शिष्यः, ते, अहम्, शाधि, माम्, त्वाम्, प्रपन्नम्।।" "अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं, ""हे भगवन! आपका शिष्य होने के नाते मैं आपकी शरण में आया हूँ। इस युद्ध के विचार ने मुझे कमज़ोर बना दिया है और मैं सही और गलत के बीच फैसला नहीं कर पा रहा हूँ। इसलिए कृपया कर अब आगे आप ही मुझे रास्ता दिखाएँ।"""

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10 min 29 sec

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श्लोक 8

8 . श्लोक 8

"न, हि, प्रपश्यामि, मम, अपनुद्यात्, यत्, शोकम्, उच्छोषणम्, इन्द्रियाणाम्, अवाप्य, भूमौ, असपत्नम्, ऋद्धम्, राज्यम्, सुराणाम्, अपि,च,आधिपत्यम्।।" "अर्जुन आगे कहते हैं, ""हे भगवन! युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद, मुझे संपूर्ण पृथ्वी का राज्य, धन और संपत्ति तो प्राप्त होंगे, लेकिन इनमें से कुछ भी मेरे उस दुःख की भरपाई नहीं कर पाएंगे जो मुझे अपनों को मारकर होगा।"""

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07 min 43 sec

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श्लोक 9

9 . श्लोक 9

"एवम्, उक्त्वा, हृषीकेशम्, गुडाकेशः, परन्तप, न, योत्स्ये, इति, गोविन्दम्, उक्त्वा, तूष्णीम्, बभूव, ह।।" "संजय दृतराष्ट्र से कहते हैं, ""हे राजन! निद्रा को जीतने वाले अर्जुन अंतर्यामी श्रीकृष्ण को फिर से कहते हैं- ""मैं युद्ध नहीं करूंगा।"" ये स्पष्ट कहकर चुप हो जाते हैं।"" "

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श्लोक 10

10 . श्लोक 10

"तम्, उवाच, हृषीकेशः, प्रहसन्, इव, भारत, सेनयोः, उभयोः, मध्ये, विषीदन्तम्, इदम्, वचः।।" "संजय ने धृतराष्ट्र से कहा, ""हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! अन्तर्यामी श्रीकृष्ण महाराज दोनों सेनाओं के बीच में शोक करते हुए उस अर्जुन को हँसते हुए से यह वचन बोले।"""

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06 min 53 sec

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