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श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय ४

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय ४

Duration

2hr 38m

Language

Hindi

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Devotional

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इस शो में हम आपको श्रीमद्‍भगवद्‍गीता के चौथे अध्याय के श्लोक सुनाएंगे और उनके मतलब समझाएंगे।

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श्लोक 1

1 - श्लोक 1

07 min 57 sec

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श्लोक 2

2 - श्लोक 2

05 min 06 sec

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श्लोक 3

3 - श्लोक 3

05 min 32 sec

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श्लोक 4

4 - श्लोक 4

03 min 32 sec

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श्लोक 5

5 - श्लोक 5

04 min 44 sec

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श्लोक 6

6 - श्लोक 6

05 min 50 sec

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श्लोक 7

7 - श्लोक 7

03 min 33 sec

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श्लोक 8

8 - श्लोक 8

04 min 24 sec

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श्लोक 9

9 - श्लोक 9

05 min 06 sec

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श्लोक 10

10 - श्लोक 10

04 min 49 sec

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श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय ४

Devotional|Hindi|42 Episodes
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इस शो में हम आपको श्रीमद्‍भगवद्‍गीता के चौथे अध्याय के श्लोक सुनाएंगे और उनके मतलब समझाएंगे।

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श्लोक 1

1 . श्लोक 1

"ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन। तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥ " "अर्जुन ने कहा - हे जनार्दन! हे केशव! यदि आप निष्काम-कर्म मार्ग की अपेक्षा ज्ञान-मार्ग को श्रेष्ठ समझते है तो फिर मुझे भयंकर कर्म (युद्ध) में क्यों लगाना चाहते हैं?"

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07 min 57 sec

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श्लोक 2

2 . श्लोक 2

"व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे । तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्‌ ॥" "आप अनेक अर्थ वाले शब्दों से मेरी बुद्धि को मानो मोहित कर रहे हैं, अत: इनमें से मेरे लिये जो एकमात्र श्रेयस्कर हो उसे कृपा करके निश्चय-पूर्वक मुझे बतायें, जिससे में उस श्रेय को प्राप्त कर सकूँ।"

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05 min 06 sec

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श्लोक 3

3 . श्लोक 3

"लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ । ज्ञानयोगेन साङ्‍ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्‌ ॥" "श्रीभगवान ने कहा - हे निष्पाप अर्जुन! इस संसार में आत्म-साक्षात्कार की दो प्रकार की विधियाँ पहले भी मेरे द्वारा कही गयी हैं, ज्ञानीयों के लिये ज्ञान-मार्ग (सांख्य-योग) और योगियों के लिये निष्काम कर्म-मार्ग (भक्ति-योग) नियत है।"

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05 min 32 sec

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श्लोक 4

4 . श्लोक 4

"न कर्मणामनारंभान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते । न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥" "मनुष्य न तो बिना कर्म किये कर्म-बन्धनों से मुक्त हो सकता है और न ही कर्मों के त्याग (सन्यास) मात्र से सफ़लता (सिद्धि) को प्राप्त हो सकता है।"

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03 min 32 sec

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श्लोक 5

5 . श्लोक 5

"न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्‌ । कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥" "कोई भी मनुष्य किसी भी समय में क्षण-मात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता है क्योंकि प्रत्येक मनुष्य प्रकृति से उत्पन्न गुणों द्वारा विवश होकर कर्म करता है।"

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04 min 44 sec

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श्लोक 6

6 . श्लोक 6

"कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्‌ । इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥" "जो मनुष्य कर्म-इन्द्रियों को वश में तो करता है किन्तु मन से इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, ऎसा मूर्ख जीव मिथ्याचारी कहलाता है।"

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05 min 50 sec

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श्लोक 7

7 . श्लोक 7

"यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन । कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥" "हे अर्जुन! जो मनुष्य मन के द्वारा इन्द्रियों को वश में करने का प्रयत्न करता है और बिना किसी आसक्ति के कर्म-योग (निष्काम कर्म-योग) का आचरण करता है, वही सभी मनुष्यों में अति-उत्तम मनुष्य है।"

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श्लोक 8

8 . श्लोक 8

"नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः। शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः ॥" "हे अर्जुन! तू अपना नियत कर्तव्य-कर्म कर क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है, कर्म न करने से तो तेरी यह जीवन-यात्रा भी सफ़ल नहीं हो सकती है।"

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04 min 24 sec

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श्लोक 9

9 . श्लोक 9

"यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबंधनः । तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर ॥" "यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है इस यज्ञ की प्रक्रिया के अतिरिक्त जो भी किया जाता है उससे जन्म-मृत्यु रूपी बन्धन उत्पन्न होता है, अत: हे कुन्तीपुत्र! उस यज्ञ की पूर्ति के लिये संग- दोष से मुक्त रहकर भली-भाँति कर्म का आचरण कर।"

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श्लोक 10

10 . श्लोक 10

"सहयज्ञाः प्रजाः सृष्टा पुरोवाचप्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्‌ ॥" "सृष्टि के प्रारम्भ में प्रजापति ब्रह्मा ने यज्ञ सहित देवताओं और मनुष्यों को रचकर उनसे कहा कि तुम लोग इस यज्ञ द्वारा सुख-समृध्दि को प्राप्त करो और यह यज्ञ तुम लोगों की इष्ट (परमात्मा) संबन्धित कामना की पूर्ति करेगा।"

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04 min 49 sec

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