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श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय १

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय १

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2hr 49m

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Hindi

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Devotional

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युद्धभूमि में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिया था वह श्रीमद्भगवदगीता के नाम से प्रसिद्ध है। श्रीमद्भगवद्‌गीता की पृष्ठभूमि महाभारत का युद्ध है। जिस प्रकार एक सामान्य मनुष्य अपने जीवन की समस्याओं में उलझकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है और उसके पश्चात जीवन के समरांगण से पलायन करने का मन बना लेता है उसी प्रकार अर्जुन जो महाभारत का महानायक है अपने सामने आने वाली समस्याओं से भयभीत होकर जीवन और क्षत्रिय धर्म से निराश हो गया है, अर्जुन की तरह ही हम सभी कभी-कभी अनिश्चय की स्थिति में या तो हताश हो जाते हैं और या फिर अपनी समस्याओं से उद्विग्न होकर कर्तव्य विमुख हो जाते हैं ऐसे समय से निकलने के लिए हम आपके लिए लेकर आए है स्वयं भगवान कृष्णा की वाणी मे  दिया हुआ ज्ञान जिसे आप सुन सकते है हमारे इस शो श्रीमद्भगवदगीता में  सिर्फ aawaz.com  पर

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श्लोक 1

1 - श्लोक 1

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श्लोक 2

2 - श्लोक 2

04 min 37 sec

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श्लोक 3

3 - श्लोक 3

04 min 19 sec

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श्लोक 4

4 - श्लोक 4

04 min 46 sec

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श्लोक 5, 6

5 - श्लोक 5, 6

06 min 54 sec

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श्लोक 7, 8

6 - श्लोक 7, 8

06 min 59 sec

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श्लोक 9

7 - श्लोक 9

06 min 47 sec

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श्लोक 10

8 - श्लोक 10

05 min 15 sec

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श्लोक 11

9 - श्लोक 11

05 min 25 sec

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श्लोक 12

10 - श्लोक 12

03 min 27 sec

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श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय १

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युद्धभूमि में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिया था वह श्रीमद्भगवदगीता के नाम से प्रसिद्ध है। श्रीमद्भगवद्‌गीता की पृष्ठभूमि महाभारत का युद्ध है। जिस प्रकार एक सामान्य मनुष्य अपने जीवन की समस्याओं में उलझकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है और उसके पश्चात जीवन के समरांगण से पलायन करने का मन बना लेता है उसी प्रकार अर्जुन जो महाभारत का महानायक है अपने सामने आने वाली समस्याओं से भयभीत होकर जीवन और क्षत्रिय धर्म से निराश हो गया है, अर्जुन की तरह ही हम सभी कभी-कभी अनिश्चय की स्थिति में या तो हताश हो जाते हैं और या फिर अपनी समस्याओं से उद्विग्न होकर कर्तव्य विमुख हो जाते हैं ऐसे समय से निकलने के लिए हम आपके लिए लेकर आए है स्वयं भगवान कृष्णा की वाणी मे  दिया हुआ ज्ञान जिसे आप सुन सकते है हमारे इस शो श्रीमद्भगवदगीता में  सिर्फ aawaz.com  पर

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श्लोक 1

1 . श्लोक 1

"धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥" इस श्लोक में धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं कि कुरुक्षेत्र में उनके पुत्रों और पांडवों ने क्या किया। आइये सुनते हैं इस श्लोक का पूरा भावार्थ।

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श्लोक 2

2 . श्लोक 2

"दृष्टवा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा । आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्‌ ॥" "इस श्लोक में संजय धृतराष्ट्र से कहते हैं कि पांडवों की युद्ध संबंधी व्यवस्था देखने के बाद दुर्योधन ने अपने गुरु द्रोण से संपर्क किया है। आइये समझें इस श्लोक का भावार्थ "

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श्लोक 3

3 . श्लोक 3

"पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्‌ । व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥" इस श्लोक में दुर्योधन अपने गुरु द्रोण से कहते हैं, "हे आचार्य! आपके बुद्धिमान्‌ शिष्य द्रुपद पुत्र धृष्टद्युम्न ने इस विशाल सेना को कितने कौशल से व्यवस्थित किया है, देखिये.

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श्लोक 4

4 . श्लोक 4

"अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि । युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥" युद्ध में भीम और अर्जुन के समान इस सेना में महान धनुर्धारी सात्यकि, महारथी राजा द्रुपद तथा विराट जैसे वीर पुरुष है।

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श्लोक 5, 6

5 . श्लोक 5, 6

"धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्‌ । पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङवः ॥ युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्‌ । सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥" "धृष्टकेतु और चेकितान तथा बलवान काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य, पराक्रमी युधामन्यु तथा बलवान उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु एवं द्रौपदी के पांचों पुत्र ये सभी महारथी हैं।"

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श्लोक 7, 8

6 . श्लोक 7, 8

"अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम । नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥ भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः । अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥" इस श्लोक में दुर्योधन गुरु द्रोण से कहते हैं, "मैं अपनी सेना के उन नायकों के बारे में बताना चाहता हूं जो सेना को संचालित करने में निपूर्ण है। हमारी सेना में आप, भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वथामा, विकर्ण तथा भूरिश्रवा हैं जो युद्ध में कभी नहीं हारे।

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श्लोक 9

7 . श्लोक 9

"अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः । नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥" दुर्योधन गुरु द्रोण से कहते हैं, "और भी अनेक वीर हैं जो मेरे लिए अपना जीवन त्याग करने के लिए तत्पर हैं और वे सभी अलग-अलग हथियारों के साथ-साथ युद्धकला में निपुण हैं।"

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श्लोक 10

8 . श्लोक 10

"अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्‌ । पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्‌ ॥" दुर्योधन गुरु द्रोण से कहते हैं, "हम सभी पितामह द्वारा संरक्षित हैं और हमारी शक्ति अपरिमेय है। वहीं, पांडवों की शक्ति भीम की वजह से संरक्षित होकर भी सिमित है।

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श्लोक 11

9 . श्लोक 11

"अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः । भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥" दुर्योधन आगे कहते हैं, "इसलिए इस सैन्य रचना में अपने-अपने मोर्चों पर खड़े रहकर आप सभी पितामह भीष्म को अपनी पूरी सहायता दें।"

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श्लोक 12

10 . श्लोक 12

"तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः । सिंहनादं विनद्योच्चैः शंख दध्मो प्रतापवान्‌ ॥" इसके बाद कुरुवंश के परम प्रतापी और वृद्ध पितामह ने सिंह की गर्जना जैसी ध्वनि वाला अपना शंक उच्च स्वर में बजाया जिससे दुर्योधन को बेहद हर्ष हुआ।

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