श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय ११
Duration
1hr 24m
Language
Hindi
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Category
Devotional
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1 - श्लोक १
02 min 58 sec
7
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2 - श्लोक २
02 min 08 sec
5
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3 - श्लोक ३
02 min 41 sec
5
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4 - श्लोक ४
04 min 59 sec
7
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5 - श्लोक ५
01 min 54 sec
4
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6 - श्लोक ६
03 min 41 sec
5
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7 - श्लोक ७
01 min 23 sec
3
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8 - श्लोक ८
03 min 08 sec
11
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9 - श्लोक ९ - श्लोक १४
04 min 40 sec
4
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10 - श्लोक १५ - श्लोक ३१
11 min 23 sec
5
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श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय ११
About Show
| Episodes | Duration | |||
1 . श्लोक १अर्जुन बोले- मुझ पर अनुग्रह करने के लिए आपने जो परम गोपनीय अध्यात्म विषयक वचन अर्थात उपदेश कहा, उससे मेरा यह अज्ञान नष्ट हो गया है। More | 02 min 58 sec | |||
2 . श्लोक २क्योंकि हे कमलनेत्र! मैंने आपसे भूतों की उत्पत्ति और प्रलय विस्तारपूर्वक सुने हैं तथा आपकी अविनाशी महिमा भी सुनी है। More | 02 min 08 sec | |||
3 . श्लोक ३हे परमेश्वर! आप अपने को जैसा कहते हैं, यह ठीक ऐसा ही है, परन्तु हे पुरुषोत्तम! आपके ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज से युक्त ऐश्वर्य-रूप को मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ। More | 02 min 41 sec | |||
4 . श्लोक ४हे प्रभु ! (उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय तथा अन्तर्यामी रूप से शासन करने वाला होने से भगवान का नाम 'प्रभु' है) यदि मेरे द्वारा आपका वह रूप देखा जाना शक्य है- ऐसा आप मानते हैं, तो हे योगेश्वर! उस अविनाशी स्वरूप का मुझे दर्शन कराइए। More | 04 min 59 sec | |||
5 . श्लोक ५श्री भगवान बोले- हे पार्थ! अब तू मेरे सैकड़ों-हजारों नाना प्रकार के और नाना वर्ण तथा नाना आकृतिवाले अलौकिक रूपों को देख। More | 01 min 54 sec | |||
6 . श्लोक ६हे भरतवंशी अर्जुन! तू मुझमें आदित्यों को अर्थात अदिति के द्वादश पुत्रों को, आठ वसुओं को, एकादश रुद्रों को, दोनों अश्विनीकुमारों को और उनचास मरुद्गणों को देख तथा और भी बहुत से पहले न देखे हुए आश्चर्यमय रूपों को देख। More | 03 min 41 sec | |||
7 . श्लोक ७हे अर्जुन! अब इस मेरे शरीर में एक जगह स्थित चराचर सहित सम्पूर्ण जगत को देख तथा और भी जो कुछ देखना चाहता हो सो देख। More | 01 min 23 sec | |||
8 . श्लोक ८परन्तु मुझको तू इन अपने प्राकृत नेत्रों द्वारा देखने में निःसंदेह समर्थ नहीं है, इसी से मैं तुझे दिव्य अर्थात अलौकिक चक्षु देता हूँ, इससे तू मेरी ईश्वरीय योग शक्ति को देख। More | 03 min 08 sec | |||
9 . श्लोक ९ - श्लोक १४अध्याय 11 के श्लोक 9 से 14 में वर्णन है कि संजय द्वारा विश्वरूप (काल रूप) का वर्णन:- कई नेत्रों, कई मुखों वाला तथा शस्त्रों सहित कई हाथों वाला असीम काल (विराट) रूप अर्जुन ने देखा। हजारों सूर्य एक साथ उदय हो जाएँ ऐसे तेजोमय रूप में अर्जुन ने शरीर को देखा। यह सब देखते हुए काल देव से आश्चर्य चकित तथा हर्षित होते हुए बोला। More | 04 min 40 sec | |||
10 . श्लोक १५ - श्लोक ३१"अध्याय 11 के श्लोक 21 अर्जुन आँखों देखा हाल कह रहा है कि वे ही देवताओं के समूह आपमें भयभीत होकर आपके मुख में प्रवेश कर रहे हैं। कुछ भयभीत हो कर हाथ जोड़े आपके गुणों का उच्चारण (कीर्तन) करते हैं, ऋषियों-सिद्धों का समुदाय कल्याण हो! ऐसा कहकर उत्तम-2 स्त्रोतों द्वारा आपकी स्तुति करते हैं अर्थात् आप अपने उपासको को भी खा रहे हो। अध्याय 11 के श्लोक 15 से 30 तक में अर्जुन कह रहा है कि हे देव! आपके शरीर में सम्पूर्ण देवताओं तथा प्राणियों के समूह को तथा कमल पर ब्रह्मा को तथा सम्पूर्ण ऋषियों को देख रहा हूँ। और आपको कई भुजाओं, पेट, मुख और नेत्रों से युक्त देखता हूँ। परंतु इसका कोई वार-पार नहीं देख रहा हूँ तथा आपके इस भंयकर रूप को देख रहा हूँ। अन्य आपको हैरान होकर देख रहे हैं तथा व्याकुल हो रहे हैं। मैं (अर्जुन) भी व्याकुल हो रहा हूँ। चूंकि हे विष्णो! आपके भयंकर रूप को देखकर मैं बहुत डर गया हूँ। धीरज व शांति नहीं पा रहा हूँ तथा वे सब धृतराष्ट्र के पुत्र व राजाओं का समुदाय आपमें प्रवेश कर रहा है। कई तो बहुत वेग (स्पीड) से आपके मुख में जा रहे हैं तथा कुछ आपकी दाढ़ो (जाड़ों) द्वारा कुचले जा रहे हैं, कुछ दाँतों में लगे हुए दिखाई दे रहे हैं। और जैसे नदियाँ समुद्र में गिर रही हों ऐसे मनुष्य लोक (पृथ्वी लोक) के वीर (योद्धा) भी आपमें प्रवेश कर रहे हैं। तथा जैसे कीट-पतंग अग्नि पर गिरते हैं ऐसे सब प्राणी (देव- ऋषि-सिद्ध- आम जीव सहित) आपके मुख में प्रवेश कर रहे हैं और आप सम्पूर्ण लोकों (ब्रह्मा-लोक, विष्णु-लोक, शिव-लोक तथा सर्व चैदह लोकों समेत) को खा (ग्रास) रहे हो और बार-2 होंठ चाट रहे हो। आपके शरीर की अग्नि सम्पूर्ण जगत को जला रही है। अध्याय 11 के श्लोक 31 में अर्जुन पूछता है कि हे उग्ररूप वाले देवश्रेष्ठ! आपको नमस्कार हो। कृप्या मुझे बताईये कि वास्तव में आप कौन हैं? मैं विशेष रूप से जानना चाहता हूँ। ध्यान रहे कि श्री कृष्ण की बहन सुभद्रा का विवाह अर्जुन से हुआ था। इस नाते से श्री कृष्ण अर्जुन के साले थे। अर्जुन पूछ रहा है कि आप कौन हो? विचारणीय विषय यह भी है कि क्या व्यक्ति अपने साले से पूछता है कि आप कौन हो? इससे सिद्ध है कि काल ब्रह्म ने विराट रूप दिखाया था। श्री कृष्ण को कुछ समय अन्तध्र्यान कर दिया था। इससे यह भी सिद्ध हुआ कि गीता का ज्ञान काल ने कहा है जो गीता अध्याय 11 श्लोक 32 में स्वयं कह रहा है कि मैं काल हूँ।" More | 11 min 23 sec |
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