Logo
Logo
mic
Download
श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय ७

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय ७

Duration

2hr 8m

Language

Hindi

Released

Category

Devotional

Like

Favorite

like

Review

play

Play

share

Share

इस शो में हम आपको श्रीमद्‍भगवद्‍गीता के सातवें अध्याय के श्लोक सुनाएंगे और उनके मतलब समझाएंगे।

Read More

श्लोक १

1 - श्लोक १

07 min 03 sec

Like

20

play...

Episode info

info

Share Episode

share
श्लोक २

2 - श्लोक २

03 min 32 sec

Like

9

play...

Episode info

info

Share Episode

share
श्लोक ३

3 - श्लोक ३

04 min 21 sec

Like

7

play...

Episode info

info

Share Episode

share
श्लोक ४

4 - श्लोक ४

04 min 45 sec

Like

10

play...

Episode info

info

Share Episode

share
श्लोक ५

5 - श्लोक ५

04 min 21 sec

Like

9

play...

Episode info

info

Share Episode

share
श्लोक ६

6 - श्लोक ६

03 min 39 sec

Like

8

play...

Episode info

info

Share Episode

share
श्लोक ७

7 - श्लोक ७

06 min 14 sec

Like

10

play...

Episode info

info

Share Episode

share
श्लोक ८

8 - श्लोक ८

06 min 20 sec

Like

8

play...

Episode info

info

Share Episode

share
श्लोक ९

9 - श्लोक ९

05 min 45 sec

Like

10

play...

Episode info

info

Share Episode

share
श्लोक १०

10 - श्लोक १०

03 min 03 sec

Like

5

play...

Episode info

info

Share Episode

share

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय ७

Devotional|Hindi|30 Episodes
Like
share
like

About Show

इस शो में हम आपको श्रीमद्‍भगवद्‍गीता के सातवें अध्याय के श्लोक सुनाएंगे और उनके मतलब समझाएंगे।

....Loading

EpisodesDuration
श्लोक १

1 . श्लोक १

"मयि, आसक्तमनाः, पार्थ, योगम्, युंजन्, मदाश्रयः, असंशयम्, समग्रम्, माम्, यथा, ज्ञास्यसि, तत्, श्रृणु" हे पार्थ! मुझमें आसक्तचित भाव से मेरे मत के परायण होकर योग में लगा हुआ तू जिस प्रकार से सम्पूर्ण रूप से मुझको संश्यरहित जानेगा उसको सुन।

More

07 min 03 sec

play

share

श्लोक २

2 . श्लोक २

"ज्ञानम्, ते, अहम्, सविज्ञानम्, इदम्, वक्ष्यामि, अशेषतः, यत्, ज्ञात्वा, न, इह, भूयः, अन्यत्, ज्ञातव्यम्, अवशिष्यते" मैं तेरे लिये इस विज्ञानसहित तत्वज्ञान को सम्पूर्णतया कहूँगा जिसको जानकर संसार में फिर और कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं रह जाता।

More

03 min 32 sec

play

share

श्लोक ३

3 . श्लोक ३

"मनुष्याणाम्, सहस्त्रोषु, कश्चित्, यतति, सिद्धये, यतताम्, अपि, सिद्धानाम्, कश्चित्, माम्, वेत्ति, तत्त्वतः" हजारों मनुष्यों में कोई एक प्रभु प्राप्ति के लिये यत्न करता है यत्न करने वाले योगियों में भी कोई एक मुझको तत्व से अर्थात् यथार्थरूप से जानता है।

More

04 min 21 sec

play

share

श्लोक ४

4 . श्लोक ४

"भूमिः, आपः, अनलः, वायुः, खम्, मनः, बुद्धिः, एव, च, अहंकारः, इति, इयम्, मे, भिन्ना, प्रकृतिः, अष्टधा" पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश आदि से स्थूल शरीर बनता है, इसी प्रकार मन बुद्धि और अहंकार आदि से सूक्ष्म शरीर बनता है इस प्रकार यह आठ प्रकार से अर्थात् अष्टंगी ही विभाजित मेरी प्रकृति अर्थात् दुर्गा है।

More

04 min 45 sec

play

share

श्लोक ५

5 . श्लोक ५

"अपरा, इयम्, इतः, तु, अन्याम्, प्रकृतिम्, विद्धि, मे, पराम्, जीवभूताम्, महाबाहो, यया, इदम्, धार्यते, जगत्" ये तो अपरा अर्थात् इसके तुल्य दूसरी देवी नहीं है तथा उपरोक्त दोनों शरीरों में इसी का परम योगदान है और हे महाबाहो! इससे दूसरी को जिससे यह सम्पूर्ण जगत् संभाला जाता है। मेरी जीवरूपा चेतन दूसरी साकार चेतन प्रकृति अर्थात् दुर्गा जान। क्योंकि दुर्गा ही अन्य रूप बनाकर सागर में छुपी तथा लक्ष्मी-सावित्री व उमा रूप बनाकर तीनों देवों (ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव) से विवाह करके जीवों की उत्पत्ति की।

More

04 min 21 sec

play

share

श्लोक ६

6 . श्लोक ६

"एतद्योनीनि, भूतानि, सर्वाणि, इति, उपधारय, अहम्, कृत्स्न्नस्य, जगतः, प्रभवः, प्रलयः, तथा" इस प्रकार भूल भूलईयां करके सम्पूर्ण प्राणी इन दोनों प्रकृतियों से ही उत्पन्न होते हैं और मैं सम्पूर्ण जगत का उत्पन्न तथा नाश हूँ।

More

03 min 39 sec

play

share

श्लोक ७

7 . श्लोक ७

"मत्तः, परतरम्, न, अन्यत्, किंचित, अस्ति, धनंजय, मयि, सर्वम्, इदम्, प्रोतम्, सूत्रो, मणिगणाः, इव" हे धनंजय! उपरोक्त अर्थात् सिद्धान्त से दूसरा कोई भी परम कारण नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् सूत्र में मणियों के सदृश मुझ में गुँथा हुआ है।

More

06 min 14 sec

play

share

श्लोक ८

8 . श्लोक ८

"रसः, अहम्, अप्सु, कौन्तेय, प्रभा, अस्मि, शशिसूर्ययोः, प्रणवः, सर्ववेदेषु, शब्दः, खे, पौरुषम्, नृषु" हे अर्जुन! मैं जल में रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, सम्पूर्ण वेदों में ओंकार हूँ, आकाश में शब्द और मनुष्यों में पुरुषत्व हूँ।

More

06 min 20 sec

play

share

श्लोक ९

9 . श्लोक ९

"पुण्यः, गन्धः, पृथिव्याम्, च, तेजः, च, अस्मि, विभावसौ, जीवनम्, सर्वभूतेषु, तपः, च, अस्मि, तपस्विषु" पृथ्वी में पवित्र गंध और अग्नि में तेज हूँ, तथा सम्पूर्ण प्राणीयों में उनका जीवन हूँ और तपस्वियों में तप हूँ।

More

05 min 45 sec

play

share

श्लोक १०

10 . श्लोक १०

"बीजम्, माम्, सर्वभूतानाम्, विद्धि पार्थ, सनातनम्, बुद्धिः, बुद्धिमताम्, अस्मि, तेजः, तेजस्विनाम्, अहम्" हे अर्जुन! तू सम्पूर्ण प्राणियों का आदि कारण मुझको ही जान, मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ।

More

03 min 03 sec

play

share